आओ खेले दंगा – दंगा
होने दो वोटर को नंगा
किस्तम ने मौहाल बिग़ाड़ा
लूटो वोटे , कर लो पंगा
मुद्दों को भटकाने आए
सत्ता पर्व मनाने आए
बेसरमी की रेस लगाओ
होके नबंर एक लफंगा
मरने दो भूख से जनता
जीत की खुशबू से हम चंगा
आओ खेले दंगा – दंगा
होने दो वोटर को नंगा
Monday, January 6, 2020
आओ खेले दंगा – दंगा
Monday, March 26, 2018
सवाल
Thursday, January 25, 2018
लफ्ज़
आओ कुछ लफ्ज़ बिखेरे.
ले ले जज़्बातों के फेरे..
सर्दी में खटिया पे सुखाए
या फिर आचल में काढ़े उकेरे ..
इन्हे कैनवास पे सजाए चितेरे
कुछ रेशमी , कुछ कपासी ,
कुछ तेरे कुछ मेरे ..
आओ कुछ लफ्ज़ बिखेरे.
ले ले जज़्बातों के फेरे..
Tuesday, November 1, 2016
देश यही है , यही है दुनिया
Saturday, August 20, 2016
खेत क्या होता है ? , पूछेगे लोग
Friday, August 19, 2016
सौधा सौधा सा था
Saturday, May 7, 2016
बोतलें
काट के जंगल बनाया है शहर हमने
अब बोतलों में यहाँ जंगल को तरसते हैं
सुखा के पानी हम बने आका से फिरते है
सब बोतलों में चुल्लू बना के डूबते है रोज़
- आकाश पाण्डेय
8 मई 2016
Sunday, May 1, 2016
शाम
बेलफ्ज़ हो गए हम उस शाम को ,
अब तरसेगे हर शाम उस नाम को ।
वो रास्ते तो बेफ़िक्र से लगते थे हमे
वो अँधेरे से लगते है मुझ गुमनाम को।
Wednesday, December 9, 2015
अहमक
अब उन गलियों में जाता नहीं
जहाँ कागज़ की कश्ती बहाता था मैं
छोटू से सयाना बन के मैं अहमक
कागज़ में खुद को गवांता हूँ मैं
- आकाश पाण्डेय
Thursday, October 29, 2015
फसल
तेरे ख्वाबो में ना जाने कब सुबह हो गई..
रातें भर तेरे नाम की फसल है बोई.
उगाता हूँ तेरा नाम , बोता भी हूँ .
सीचता हूँ जिगर से .. पर काटता है कोई ..
Monday, October 19, 2015
जी नहीं हम सनसनी से है
भारत की आजादी की पहली लड़ाई
अर्थात् १८५७ के विद्रोह की शुरुआत
मंगल पाण्डेय से हुई जब
गाय व सुअर कि चर्बी लगे कारतूस लेने से
मना करने पर उन्होंने विरोध जताया..
सभी चैनल उनके पास पहुच गए..
पाण्डेय जी आप सेकुलर है या .. कम्युनल ?
पाण्डेय जी सोच में पड गए ?
बोले मैं वतन के बेटा हूँ ?
चैनल ; वो किस पार्टी में थे ?
पाण्डेय जी मुस्कुराए बोले : आप CNN से है क्या ?
चैनल बोले जी नहीं हम सनसनी से है .
- © आकाश पाण्डेय
Wednesday, October 14, 2015
हम चाँद पर लिखते रहे
और वो नासा के सेटेलाइट से नैना मिलाता रहा
फिर सोचा पा के मंगल को , तुझसे बेवफ़ा हो जायेगे
कुंडली बनवा के अब मगली हो जायेगे...
- © आकाश पाण्डेय
Friday, October 9, 2015
गाय - आकाश पाण्डेय
गाय सोच रही है काश वो काला हिरन होती
या होती "सेव दी टाइगर" वाली शेर..
या कोई सफ़ेद बुलबुल ..
वो तो गाय है ..
काश उसके पास वोटर आई कार्ड होता
या वो होती राणा , नानक , जीजस, हुसैन
या शिवाजी की कहानी का हिस्सा ..
काश वो कश्मीर होती ..
या होती नौकरी जिसके
आरक्षण के लिए सब लड़ते
पर वो तो
अमूल का फूल क्रीम का पैकेट है
और वो है पनीर का टुकड़ा
वो तो माँ है
जिसे दिवाली पे
मैसेज भेज के हम छुटकारा पा लेते है
"हैप्पी दिवाली मॉम"
- आकाश पाण्डेय
Friday, September 25, 2015
रक्त ही रक्त
रक्त ही रक्त ..शीश विभक्त
शिशुओ के धड़ अलग
कपाल लिए आसक्त ..
मुख सुर्ख , आखे अंधी
ममता छत विक्षत..
रक्त ही रक्त .. शीश विभक्त ।
Friday, September 4, 2015
Tuesday, May 5, 2015
दूपहरिया का फूल ..
और चटकती धूप में उठते
मन में धूल के बवंडर ..
आज पता लग गया की
गेहू कनक नही होता ..
और न किसान भगत सिंह
मेरी लटकती रस्सी के स्टीकर
लगे कपो में कॉफ़ी पी के वो
करते रहेगे महसूस
क्रांतिकारी.. बहुत क्रांतिकारी ..
#AakashPandeyFB