आओ कुछ लफ्ज़ बिखेरे.
ले ले जज़्बातों के फेरे..
सर्दी में खटिया पे सुखाए
या फिर आचल में काढ़े उकेरे ..
इन्हे कैनवास पे सजाए चितेरे
कुछ रेशमी , कुछ कपासी ,
कुछ तेरे कुछ मेरे ..
आओ कुछ लफ्ज़ बिखेरे.
ले ले जज़्बातों के फेरे..
Thursday, January 25, 2018
लफ्ज़
Tuesday, November 1, 2016
देश यही है , यही है दुनिया
फ़ेसबुक पे करे लड़ाई
एक दूजे से भाई भाई
मजहब को भी यही बचाए
जान की बाज़ी यही लगाए
देश यही है , यही है दुनिया
बेचे बातें बन के बनिया
फ़ेसबुक पे करे लड़ाई
एक दूजे से भाई भाई
बात बात में गाली छाटें
और मिल के नफ़रत बाटें
लाइक करे है चौड़ी छाती
नीली टिक है ऊँची जाती
फेंक पत्थर कमेंट के मारो
मारो ताने जम के यारों
फ़ेसबुक पे करे लड़ाई
एक दूजे से भाई भाई
- आकाश पांडेय
Saturday, August 20, 2016
खेत क्या होता है ? , पूछेगे लोग
खेत क्या होता है ? , पूछेगे लोग
किसान तो एक सॉस का नाम है हम जानते है ।
मिल्क पैकेट से आता है , ये भी पता है
और गेहूँ ? बाली ?
बाली आइ नो ।। वो जो कान में पहनते है ।
खेत क्या होता है ? , पूछेगे आज़ाद लोग
- आकाश पांडेय , आज़ाद भारत , मुंबई २१ अगस्त , सन २०१६
Friday, August 19, 2016
सौधा सौधा सा था
बचपन में आँगन का अँधेरा भी
सौधा सौधा सा था ।
वो खुशनुमा सा था ,
उसमें थी , कहानियाँ ।
मिट्टी के तेल की कुप्पी से आती
लौ से निकला काजल ।
जुगनू , बारिश की आवाज़ ,
और सुबह के सूरज की उम्मीद ।
ये अँधेरा बड़ा अजनबी सा लगता है ,
बहुत रौशनी है इसमें ।
शायद मोतियाबिंद में माँ को
ऐसा ही लगता होगा ।
बचपन में आँगन का अँधेरा भी
सौधा सौधा सा था ।
- आकाश पांडेय , मुम्बई २० अगस्त , २०१६
Saturday, May 7, 2016
बोतलें
काट के जंगल बनाया है शहर हमने
अब बोतलों में यहाँ जंगल को तरसते हैं
सुखा के पानी हम बने आका से फिरते है
सब बोतलों में चुल्लू बना के डूबते है रोज़
- आकाश पाण्डेय
8 मई 2016
Sunday, May 1, 2016
शाम
बेलफ्ज़ हो गए हम उस शाम को ,
अब तरसेगे हर शाम उस नाम को ।
वो रास्ते तो बेफ़िक्र से लगते थे हमे
वो अँधेरे से लगते है मुझ गुमनाम को।
Wednesday, December 9, 2015
अहमक
अब उन गलियों में जाता नहीं
जहाँ कागज़ की कश्ती बहाता था मैं
छोटू से सयाना बन के मैं अहमक
कागज़ में खुद को गवांता हूँ मैं
- आकाश पाण्डेय
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