Monday, January 13, 2014

पतंग कटी

आज खिचड़ी है .. 
आसमान से एक पतंग कटी 
और सब लौंडे राहत 
कैम्प लूटने के उसको दौड़ रहे थे
शीबू से अम्मा ने कहा 
‘ जा त्यौहार है लूट ले जाके” 
अम्मा खिचड़ी होती तो लूट भी लेते.. 
कागज़ के ख्वाब तो 
मंत्री जी ने बहुत लुटा रखे है.. 
उनसे भूख थोड़े मिटेगी. 
- Aakash Pandey FBPost/13012013

आज खिचड़ी है ..

आज खिचड़ी है .. 
आसमान से एक पतंग कटी 
और राहत कैम्प के सब लौंडे 
उसको लूटने को दौड़ रहे थे
शीबू से अम्मा ने कहा 
‘ जा त्यौहार है लूट ले जाके” 
ना अम्मा इस पतंग को देख के 
दीदी की याद आती है. 
वो भी ऐसे ही दौडी थी ना . 
- Aakash Pandey FBPost 2/13012013

Saturday, December 14, 2013

रज़ाईया


सकीना आज बार बार छोटे शीबू को
आटे की बोरी उढ़ा रही थी..
लगता बाहर कोहरे ने भी
ईंसानियत को ढ़क लिया है..
जिन्हे दंगा ना मार पाया
आज उन्हे जाड़ा मार देगा
पता है उस छोटे बच्चे की ठंड से
मौत की सरकार जांच कर रही है
शीबू ने पूछा – माँ क्या जांच के बाद
हमें रज़ाईयां मिल जाएगी.. ??
मां बोली ना बेटा चुनाव तो गर्मीयों में है.
रज़ाईया कैसी??

-    -    आकाश पाण्डेय , रविवार, 15 दिसम्बर 2013

Tuesday, December 3, 2013

मिठास

बाकें के खेत में गन्ने की फसल 
खरीदार के इंतज़ार में सूख रही है.. 
ब्याज पे पैसा लिया था.. 
बेटा मुम्बई में मजूरी कर रहा है.. 
उधार चुकाने के लिए.. 
अब तो चाय भी फीकी पीता है. 
कहता है.. हमारे यहाँ गन्ना तैय्यार है.. 
फिर ना जाने क्यों इस शहर में 
मिठास नहीं पहुच रही है ?? 
- आकाश पाण्डेय 3/12/2013

Saturday, October 19, 2013

अब


अब वो वतन के ख्वाब नही देखता
ना खौलता है खून में  इंकलाब
ना देता है जुल्म को कोई जवाब
हर ओर बिछे है बाज़ारो के ख्वाब
ब्रांडो के स्टीकर चिपके है लबों पें  
चमकते बोर्डो से छुपा है आफताब
अब वो वतन के ख्वाब नही देखता
ना खौलता है खून मे इंकलाब

- आकाश पान्डेय , 19 अक्टूबर 2013 

Thursday, October 17, 2013

सब जान के भी कुछ ना कहना

सहना , चुप रहना,
सब जान के भी कुछ ना कहना 
ईएमआई , दहेज , पेंशन ,मिडल क्लास की बेड़ी 
और चार कन्धो का इंतज़ार करती बासं की सीढ़ी 
हम कैसे कुछ कहे ? 
हमारी नियती है कि हम सहें. 
वो नोट , वोट और दिल पे चोट का धंधा है.. 
हमें तो कुओं में  है रहना , सहना और चुप रहना,
सब जान के भी कुछ ना कहना 

- आकाश पाण्डेय , अक्टूबर 2013





Wednesday, October 16, 2013

थाम के वक्त को

आओ थोड़ा थाम के वक्त को
जाती इन बूंदों का लुफ्त उठाएं
आओ थोड़ी देर छोड़ के दुनियादारी
क्यारी में नन्ही कॉमिके उगाएं .
आओ रेल सी ज़िंदगी से उतर के
घर के पालने में लोरी सुन आएं
आओ फेक के ये लोहे के सिक्के
मोती से आसूं कहीं चुन के आएं
आओ इन कुर्सीओं को हटा के किनारे
छोटी सी घासों का बिछौना बनाएं
आओ थोड़ा थाम के वक्त को
जाती इन बूंदों का लुफ्त उठाएं


-    आकाश पाण्डेय – 16 अक्टूबर मुम्बई